pracheen sidhpeeth mata hinglaj mandir,
pracheen sidhpeeth mata hinglaj mandir,vill- dandrala khraur,p/o- dkaundha, teh- nabha. distt- patiala, punjab
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pandit shri jai parkash ji

हिंगलाज माता मंदिर, पाकिस्तान के बलूचिस्तान राज्य की राजधानी कराची से १२० कि॰मी॰ उत्तर-पश्चिम में हिंगोल नदी के तट पर ल्यारी तहसील के मकराना के तटीय क्षेत्र में हिंगलाज में स्थित एक हिन्दू मंदिर है। यह इक्यावन शक्तिपीठ में से एक माना जाता है और कहते हैं कि यहां सती माता के शव को भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र से काटे जाने पर यहां उनका ब्रह्मरंध्र (सिर) गिरा था। एक लोक गाथानुसार चारणों की प्रथम कुलदेवी हिंगलाज थी, जिसका निवास स्थान पाकिस्तान के बलुचिस्थान प्रान्त में था। हिंगलाज नाम के अतिरिक्त हिंगलाज देवी का चरित्र या इसका इतिहास अभी तक अप्राप्य है। हिंगलाज देवी से सम्बन्धित छंद गीत चिरजाए अवश्य मिलती है। प्रसिद्ध है कि सातो द्वीपों में सब शक्तियां रात्रि में रास रचाती है और प्रात:काल सब शक्तियां भगवती हिंगलाज के गिर में आ जाती है-
सातो द्वीप शक्ति सब रात को रचात रास।
प्रात:आप तिहु मात हिंगलाज गिर में॥
ये देवी सूर्य से भी अधिक तेजस्वी है और स्वेच्छा से अवतार धारण करती है। इस आदि शक्ति ने ८वीं शताब्दी में सिंध प्रान्त में मामड़(मम्मट) के घर में आवड देवी के रूप में द्वितीय अवतार धारण किया। ये सात बहिने थी-आवड, गुलो, हुली, रेप्यली, आछो, चंचिक और लध्वी। ये सब परम सुन्दरियां थी। कहते है कि इनकी सुन्दरता पर सिंध का यवन बादशाह हमीर सुमरा मुग्ध था। इसी कारण उसने अपने विवाह का प्रस्ताव भेजा पर इनके पिता के मना करने पर बादशाह ने उनको कैद कर लिया। यह देखकर छ: देवियाँ टू सिंध से तेमडा पर्वत पर आ गईं। एक बहिन काठियावाड़ के दक्षिण पर्वतीय प्रदेश में 'तांतणियादरा' नामक नाले के ऊपर अपना स्थान बनाकर रहने लगी। यह भावनगर कि कुलदेवी मानी जाती हैं, ओर समस्त काठियावाड़ में भक्ति भाव से इसकी पूजा होती है। जब आवड देवी ने तेमडा पर्वत को अपना निवास स्थान बनाया तब इनके दर्शनाथ अनेक चारणों का आवागमन इनके स्थान कि और निरंतर होने लगा और इनके दर्शनाथ हेतु लोग समय पाकर यही राजस्थान में ही बस गए। इन्होने तेमडा नाम के राक्षस को मारा था, अत: इन्हे तेमडेजी भी कहते है। आवड जी का मुख्य स्थान जैसलमेर से बीस मील दूर एक पहाडी पर बना है। १५वीं शताब्दी में राजस्थान अनेक छोटे छोटे राज्यों में विभक्त था। जागीरदारों में परस्पर बड़ी खींचतान थी और एक दूसरे को रियासतो में लुट खसोट करते थे, जनता में त्राहि त्राहि मची हुई थी। इस कष्ट के निवारणार्थ ही महाशक्ति हिंगलाज ने सुआप गाँव के चारण मेहाजी की धर्मपत्नी देवलदेवी के गर्भ से श्री करणीजी के रूप में अवतार ग्रहण किया।
आसोज मास उज्जवल पक्ष सातम शुक्रवार।
चौदह सौ चम्मालवे करणी लियो अवतार॥

पंजाब के जिला पटिआला की नाभा तहसील के गावं डंडराला खरौद . में अति प्राचीन सिद्धपीठ माँ हिंगलाज मंदिर अद्भुत शक्ति स्थल है,पटिआला,भादसों व नाभा से बहुत ही आसानी से यहाँ पहुंचा जा सकता है. पटिआला से यह मंदिर केवल 20 किलोमटर और भादसों से 8 किलोमीटर की दूरी पर स्तिथ है.इस मंदिर को माँ पार्वती का निवास स्थान माना जाता है.इस मंदिर की स्थापना लगभग 500 साल पहले माँ हिंगलाज के किसी परम भगत द्वारा पेशावर से माँ की ज्योति लाने से हुई थी. कहा जाता है की किसी भगत को माँ ने सपने में दर्शन दिए और पेशावर से माँ की जोत हिन्दुस्तान लाने की प्रेरणा की और उसी प्रेरणा स्वरुप माँ ने इस स्थान पर अपनी ज्योति प्रकाशित करवाई. इस मंदिर की विशेषता और मान्यता यहाँ होने वाले माँ के चमत्कारों से सारे इलाके में प्रसिद्ध हुई. यहाँ पर सूखा रोग से ग्रस्त बच्चों को पूर्ण स्वस्थ्य लाभ और निसंतान लोगों को संतान सुख की प्राप्ति होती है. इस स्थान पर प्राचीन पीपल के पेड मैं माँ का निवास माना जाता है. इसी पेड की जड़ में स्तिथ छोटे से स्थान में से बच्चे और भरी भरकम लोग भी निकल जाते हैं. यह एक अद्भुत अहसास और माँ का अपने दर पर आने वाले भगतों को आशीर्वाद माना जाता है.इस छोटे से छेद में से गुजरने को गर्भ जून की संज्ञा दी जाती है. रोग ग्रस्त बच्चे और निसंतान जोड़े शनिवार को विशेष रूप से देश के विभिन्न कोनो में से माँ की किरपा पाने हेतु आते हैं.यहाँ पर आ कर सनान करने के बाद पुराने कपडे वही पर छोड़ कर नए वस्तर धारण करके माँ की उपासना और माँ से अपने लिए इछित वरदान माँगा जाता है .माँ सैंकड़ो सालो से इस स्थान पर आने वाले भगतों की मनोकामना पूर्ण कर रही है.इस मंदिर के आस पास का दृष्य बहुत ही मनोरम है. इस मंदिर के आस पास बहुत ही हरे भरे पेड हैं.और कुछ ही दूरी पर गावं डंडराला खरौद बसा हुआ है जिसकी आबादी 5000 के लगभग है.पिछले 11वर्षों से पंडित जय प्रकाश जी माँ के दरबार की सेवा कर रहे हैं. इसी मंदिर में सेवा करते हुए माँ की किरपा से उनके घर कई वर्षों उपरांत दो लड़के पैदा हुए. दो वर्ष पहले पुरातन मूर्ती खंडित होने के बाद राजस्थान से माँ की नई प्रतिमा की विधिवत रूप से स्थापना की गई है. इस मंदिर की व्यवस्था चलाने हेतु 11 मेंबरों की कमेटी बनी हुई है.जिसमें परधान राजिंदर शर्मा,मास्टर संदीप कुमार,सुरिंदर कुमार,डॉक्टर पवन कुमार,हीरा लाल,राम पाल, राजेश कुमार, हरमेश कुमार,जसपाल जस्सी और मंदिर सरपरस्त बाबा बघेल सिंह जी मिल जुल कर इस दरबार की सेवा कर रहे हैं. साल भर में यहाँ पर चार मुख्या भंडारे किये जाते हैं. और नवरात्रों को विशेष उत्सव का आयोजन होता है.पिछले 27 वर्षों से लगातार भगवती जागरण किया जा रहा है.काँगड़ा में विशव प्रसिद्ध माँ ज्वाला जी के मंदिर में भी युगों से कुदरती रूप में जलने वाली ज्योतियों में एक ज्योति माँ हिंगलाज की मानी जाती है,

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